Biography of Parshuram in Hindi Jivani | परशुराम जीवनी

भगवान Parshuram के पितामह महान ऋषि Ricika थे जो एक प्रसिद्ध ऋषि Bhrigu के पुत्र थे | एक दिन ऋषि रिचिका अपने लिए वधु की खोंज में नगर से बाहर भ्रमण करने को निकले | उस समय दो वंश प्रमुख थे भरत-सूर्यवंश और चन्द्र वंश | चन्द्र वंश में गधी नामक एक राजा था जिसके सत्यवती नाम की पुत्री थी जिसका विवाह नही हुआ था | रुचिका ने उस नगर में प्रवेश किया और उसने राजकुमारी को दासियों के साथ बाहर जाते देखा | ऋषि उस राजकुमारी को देखकर मंत्रमुग्ध हो गये और अगले दिन राजा के दरबार में पहुच गये |

 Biography of Parshuram in Hindi Jivani | परशुराम जीवनी

भगवान Parashuram का जन्म त्रेतायुग के शुरू और सतयुग के अंत काल में हुआ था, जो की भगवान Vishnu  के छटवे अवतार माने जाते है, इनके पिता का नाम ऋषि जमदग्नि और माता का नाम रेणुका थी, पौराणिक कथाओ के अनुसार भगवान परशुराम का जन्म इनके पिता द्वारा किये गये पुत्रेष्टि यज्ञ से प्रसन्न होकर देवराज इंद्र ने प्रसन्न होकर वरदान दिया था, जो की इनकी माता रेणुका से इनका जन्म बैसाख महीने के शुक्ल तृतीया को इनका जन्म हुआ था.

Parashuramaji का उल्लेख Ramayana, Mahabharata, Bhagavata Purana और कल्कि पुराण इत्यादि अनेक ग्रन्थों में किया गया है। वे अहंकारी और धृष्ट हैहय वंशी क्षत्रियों का पृथ्वी से २१ बार संहार करने के लिए प्रसिद्ध हैं। वे धरती पर वैदिक संस्कृति का प्रचार-प्रसार करना चाहते थे। कहा जाता है कि भारत के अधिकांश ग्राम उन्हीं के द्वारा बसाये गये। वे भार्गव गोत्र की सबसे आज्ञाकारी सन्तानों में से एक थे, जो सदैव अपने गुरुजनों और माता पिता की आज्ञा का पालन करते थे। वे सदा बड़ों का सम्मान करते थे और कभी भी उनकी अवहेलना नहीं करते थे। उनका भाव इस जीव सृष्टि को इसके प्राकृतिक सौंदर्य सहित जीवन्त बनाये रखना था। वे चाहते थे कि यह सारी सृष्टि पशु पक्षियों, वृक्षों, फल फूल औए समूची प्रकृति के लिए जीवन्त रहे। उनका कहना था कि राजा का धर्म वैदिक जीवन का प्रसार करना है नाकि अपनी प्रजा से आज्ञापालन करवाना। वे एक ब्राह्मण के रूप में जन्में अवश्य थे लेकिन कर्म से एक क्षत्रिय थे। उन्हें भार्गव के नाम से भी जाना जाता है।

यह भी ज्ञात है कि Parashuram ने अधिकांश विद्याएँ अपनी Childhood में ही अपनी माता की शिक्षाओं से सीख ली थीँ (वह शिक्षा जो ८ वर्ष से कम आयु वाले बालको को दी जाती है)। वे पशु-पक्षियों तक की भाषा समझते थे और उनसे बात कर सकते थे। यहाँ तक कि कई खूँख्वार वनैले पशु भी उनके स्पर्श मात्र से ही उनके मित्र बन जाते थे।

उन्होंने सैन्यशिक्षा केवल ब्राह्मणों को ही दी। लेकिन इसके कुछ अपवाद भी हैं जैसे भीष्म और कर्ण।

Parashuram की प्रतिज्ञा 

एक बार राजा कार्तवीय सहस्त्रग्नन अपनी सेना के साथ आये Parashuram के पिता की जादुई गाय Kamdhenu नामक चोरी करने का प्रयास किया| इस बात को सुनकर उन्हें बहुत गुस्सा आया और यही कारण, उन्होंने उसकी पूरी सेना और राजा कार्तवीरिया को मार दिया। अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए, सहस्त्रग्नन के पुत्र ने Parashuram की अनुपस्थिति में जमदग्नी वध कर दिया| यह जानकार वे और क्रोधित हुए और उन्होंने राजा और उसके के सभी पुत्रों को मार दिया और धरती पर क्षत्रियो का 21 बार विनाश कर दिया| 

फिर एक सूतपुत्र समजकर भगवानParashuram ने Karn को सभी विद्याये सीखा दिया, एक दिन की बात है, भगवान Parashuram कर्ण के पैरो पर अपना सर रखकर सो रहे थे की इतने में एक भौरा आया और कर्ण के पैरो में काटना लगा, जो बहुत ही विषैला था, उसके काटने से कर्ण के पैरो से खून निकलने लगा था, लेकिन कर्ण अपने गुरु के नीद में व्यवधान न आये, टस से मस भी नही हुए, फिर थोड़ी देर बाद जब गुरु Parashuram की नींद खुली तो सारा दृश्य देखकर और कर्ण के खून को देखकर तुरंत समझ गये की यह कोई छत्रिय ही होगा और फिर उन्होंने कर्ण से पूछा की कर्ण कौन है उसके असलियत के बारे में पूछा, क्युकी भगवान परशुराम जानते थे कोई छत्रिय ही होगा जो इतना बड़ा कष्ट आसानी से झेल सकता है.